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एक प्रसिद्ध उदाहरण (कलेक्टर, कृष्णा जिला) का है, जिन्होंने गर्भपात कराने वाली प्रयोगशालाओं पर छापे मारे और लिंग परीक्षण पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
पारंपरिक समाजों में आज भी महिलाओं को घर के कामों तक सीमित देखा जाता है। कलेक्टर साहिबा का पद यह साबित करता है कि महिलाएं नेतृत्व करने और बड़े फैसले लेने में पूरी तरह सक्षम हैं।
फिल्म का सबसे धमाकेदार दृश्य वह है जब कलेक्टर बनने के बाद नायिका उसी पूर्व दूल्हे को अपने बंगले में चपरासी बना लेती है और उससे चाय बनवाती है, झाड़ू-पोछा करवाती है। यह केवल बदला नहीं है, बल्कि सामाजिक पदानुक्रम का धराशायी होना है। सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को दिया और इसकी लंबाई 139 मिनट 56 सेकंड है। एक भोजपुरी फिल्म का इतना लंबा और प्रभावी होना यह साबित करता है कि 'कलेक्टर साहिबा' का क्रेज असली है।